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वन्दहु गुरू पद ब्रह्म स्वरूपा । जिनकी वाणी अकथ अनूपा ।। वन्दहु गुरू पद नख मणि ज्योती। सुमिरत दिव्य हृदय अति होती ।। वन्दहु गुरू पद नख मणि जोई । सुमिरत दिव्य पुंज उर होई ।। जिला इटावा नाम सुहाई । नगर अहेरीपुर तहँ छाई ।। संस्कृत महाविद्यालय पाई । अति उत्तम तहँ होत पढ़ाई ।। श्री गुरू श्याम सुन्दरहि पाई । परम - पूज्य आचार्यहि छाई ।। परम पूज्य गुरू अति गुण खानी । व्याकरण न्याय वेदान्तहि ज्ञानी ।। श्यामा गुरू सब लोग पुकारहिं । ज्ञान निधान पूर सब सारहिं ।। अल्पायुहि विद्यालय आया । छोटा विद्यार्थी नाम धराया ।। गुरू - प्रसाद तहँ विद्या पाई । सह - पाठिन सह बहु हरषाई ।। गुरू प्रसाद यह विद्या पाई । तिन कर ऋणी बहुत मैं भाई ।। यह सब श्री गुरू कृपा निधानी । करहुँ समर्पित मम निजि वानी ।।
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यह सब श्री गुरू जी कृपा । मिटि सब उरहि विषाद ।। दीक्षित अतिही मन्द मति । उनका परम प्रसाद ।।
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गुरू वच किरणहि जान । ज्ञान प्रकाष अपार भरि ।। दीक्षित तिन ही मान । निवारणहि उर तमहि करि ।।
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सम्वत द्वि सहस्त्र एकहि । आष्विन शुक्लहि मान ।। दीक्षित चौदस भौमदिन । जनम सुना यह जान ।।
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जनमहि गंगा यमुना बीचा । पावन भूमि तहाँ हरि सींचा ।। जिला कानपुर जो कहलाई । गाँव ममारखपुर तहँ पाई ।। पण्डित बाबूरामहिं ज्ञानी । दीक्षित पद तिन करि कहिं जानी ।। सो मैं पूज्य पिता श्री पाई । सरल स्वभाव अतिहि सुख दाई ।। माता फूलन देवी जाई । षिषु पन महुँ वह स्वर्ग सिधाईं ।। लघु विमातु प्रेम वती पाई । लाड़ प्यार तिन नेह लगाई ।। प्रारंभिक शिक्षा ग्राम विद्यालय । मन उठि हुलषि संस्कृत आलय ।। पुन नाना घर पहुँचे धाये । कृपा कीन्हि गुरूकुल करि आये ।। कछुक काल विद्या तहँ पाई । किषोर बयसि पुनि तहँ से धाई ।। पुन शासन सेवा महुँ आई । जिला गुना सानई सुहाई ।। पूज्य पिताश्री के मन भाया । तबही उन मम ब्याह रचाया ।। भामिन सोमवती मिलि पावनि । शोभाषील रूप गुण भावनि ।। ग्राम सानई परम पुनीता । जहँ नारी नर सवहिं विनीता ।। पुन भागहि ने पल्टा खाया । शासन सेवा त्यागहि धाया ।।
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कोइ कहीं जाता नहीं । अन्न जलहि ले जाय ।। दीक्षित भूलत भटकतहि । तब मुरवासहि आय ।।
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बहुत काल तहँ रहि मुरवासा । अध्यापन मन उठी हुलासा ।। अध्यापन बरस आठ अरूबीसा । विद्या, बाटि स्वच्छ बहु शीषा ।। दिया प्रेम सम्मानहि सारी । पूरहि क्षेत्र ऋणी मैं भारी ।। पुन भागहि ने पलटी खाई । मुरवासहु कहुँ छोड़हि धाई ।। बासौदा फिर कीन्हि निवासा । भाग, भोग, जहँ रहि तहँ पासा ।। अघटित घटना पाई खाई । गुरू की कृपा ज्ञान, उर आई ।। प्रेरित श्री रमाकान्त कीन्हा । अक्षर ज्ञान लिखहु तुम चीन्हा ।। प्रेरणा उरहिमाहि समाई । प्रत्त्युतपन्न मतिहि हिय आई ।। अक्षर ज्ञान कठिन अति आई । मैं मति मन्द कहहुँ किमि गाई ।। स्वान्तः सुख हित बुद्धिहि आई । जग जानहु अक्षर कहुँ पाई ।। मन थिर करन हेतु मति आई । अक्षर ज्ञान लिखहु तुम भाई ।।
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श्री रमाकान्त की प्रेरणा । मन महुँ उठा विचार ।। अक्षर ज्ञान लिखहुँ मै । निज मति के अनुसार ।।
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